श्रीकृष्ण जन्माष्टमी: इस प्रकार रहेगा पूजा और व्रत का शुभ मुहूर्त

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मथुरा। देशभर में जन्माष्टमी की तैयारियां जोरों पर चल रही है। भाद्रपद अष्टमी को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मनाई जाती है। भगवान श्रीकृष्ण को भगवान विष्णु का एक अवतार माना जाता है। जन्माष्टमी के दिन बड़ी तादाद में भगवान कृष्ण के भक्त व्रत रखते हैं और अष्ठमी की रात 12 बजे भगवान का श्रीकृष्ण का संकेतिक रूप से जन्म होने पर व्रत का परायण करते हैं। बहुत से लोग मथुरा जाकर भगवान श्रकृष्ण की जन्मभूमि का दर्शन करते हैं। वहीं कुछ लोग अपने मुहल्ले में श्रीकृष्ण जन्म की झांकियां सजाते हैं तो कुछ लोग पास के मंदिरों में जाकर पूजा अर्चना करते हैं और उत्सव देखते हैं।

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जन्माष्टमी का मुहूर्त…

– 2 सितंबर 2018 को शाम 20:47 बजे के बाद अष्टमी तिथि शुरू होगी
– 3 सितंबर 2018 को शाम 19:19 बजे तक रहेगी

जन्माष्टमी व्रत व पूजा विधि
जन्माष्टमी की पूर्व रात्रि हल्का भोजन करें और ब्रह्मचर्य का पालन करें। प्रातःकाल स्नानादि नित्यकर्मों से निवृत्त होकर सूर्य, सोम, यम, काल, संधि, भूत, पवन, दिक्पति, भूमि, आकाश, खचर, अमर और ब्रह्मादि को नमस्कार कर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख कर बैठें। इसके बाद हाथ में जल लेकर संकल्प करें।
अब मध्याह्न के समय काले तिलों के जल से स्नान कर देवकीजी के लिए प्रसूति-गृह का निर्माण करें। तत्पश्चात भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
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मूर्ति या प्रतिमा में बालकृष्ण को स्तनपान कराती हुई देवकी अथवा लक्ष्मीजी उनके चरण स्पर्श किए हों। या ऐसी कृष्ण के जीवन के किसी भी अहम वृतांत का भाव हो।
तत्पश्चात श्री कृष्ण की प्रतिमा को पंचामृत से स्नान करवाया जाता है। उसके बाद उन्हें नए वस्त्र पहनाएं जाते है, और उनका अभिषेक किया जाता है। अभिषेक करने के बाद उन्हें सुगन्धित पुष्प, फल, मिष्ठान आदि अर्पित किये जाते है।
फिर उन्हें माखन मिश्री, जो की उनका प्रिय है उसका भोग लगाया जाता है। इसके अलावा आप जन्माष्टमी के प्रसाद में पंजीरी व् पंचामृत का भी भोग लगा सकते है।
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व्रत अगले दिन सूर्योदय के पश्चात ही तोड़ा जाना चाहिए। इसका ध्यान रखना चाहिए कि व्रत अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के समाप्त होने के पश्चात ही तोड़ा जाएं। किन्तु यदि अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र सूर्यास्त से पहले समाप्त ना हो, तो किसी एक के समाप्त होने के पश्चात व्रत तोड़े। किन्तु यदि यह सूर्यास्त तक भी संभव ना हो, तो दिन में व्रत ना तोड़े और अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र में से किसी भी एक के समाप्त होने की प्रतीक्षा करें या निशिता समय में व्रत तोड़े। ऐसी स्थिति में दो दिन तक व्रत न कर पाने में असमर्थ, सूर्योदय के पश्चात कभी भी व्रत तोड़ सकते हैं।

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