प्रतिस्पर्धा : अब बन रही अवसाद की जननी

@रविंद्र सिंह शेखावत

Ravinderv singh sekhwatज भागदौड़ की जिंदगी में हर आदमी एक मुकाम पाना चाहता है और इसे पाने के लिए जीवन पर्यंत लगा रहता है। आज युवा, बच्चे, जीवन की वो कलियां जो अभी फूटी ही हैं, जिनको सच में पता ही नहीं, जीवन क्या है, जीवन में क्या पाना है, क्यों पाना है, वो भी दौड़ रहे हैं। वो इसी उधेड़बुन में जिंदगी को जी रहे हैं, जो कि वास्तव में सिर्फ काटी जा रही है। जो कल हमारे देश का उज्जवल भविष्य बन सकते हैं उनमें से कई प्रतिस्पर्धा की दौड़ में अवसाद ग्रसित हो गए व जीवन लीला को खत्म कर गए। इन सबके लिए वो नवयुवक या किशोर जिम्मेदार नहीं है जो दौड़ नहीं पाया वरन् हम सब जिम्मेदार है, ये समाज, रिश्तेदार, उच्चकोटी के टयूशन सेंटर, शिक्षण संस्थान जिन्होंने समाज को एक बेहतर नागरिक देने के साथ और बहुत कुछ दे दिया अंदाजा लगाइए। सबकुछ पाने की हौड़ और दौड़ में इस तरीके से उस किशोर को दौडऩे पर मजबूर कर दिया कि खुद का वजूद बनाने की बजाय अपने आप को अवसाद ग्रसित महसूस करने लग गया। इसके परिणाम स्वरूप एक नई अवसाद रूपी पेड़ की कोंपलें फूटने लगी व उसकी टहनियां कब एक जिंदगी लील गई पता ही नहीं चला।
आज कई शिक्षण संस्थान, टयूशन सेंटर उच्च शिक्षा की आड़ में सिर्फ व्यापार पर केंद्रित हो गए हैं। उनका मौलिक कत्र्वय बच्चों के भविष्य को साकार रूप देने की बजाय सिर्फ पैसे पर सिमट गया है। आज राजस्थान के कई शिक्षण एवं टयूशन संस्थानों में उस किशोर मन की अवस्था को उसकी मनोस्थिति को पहचाना नहीं जाता है। समय-समय पर उनकी मानसिकता को खंगाला ही नहीं जाता या सिर्फ खानापूर्ति ही की जाती है। उन्हें समय-समय पर मोटिवेट कर दुबारा लडऩे को तैयार नहीं किया जाता। एक अच्छे ओहदेदार बनने से पहले एक बेहतर नागरिक बनने की सीख नहीं दी जाती वरन् उसके कुछ परीक्षाओं में प्राप्त अंकों के आधार पर उसे सफल बताया जाता है न कि उन्हें आभास कराए कि उनकी जिम्मेदारी और भी बहुत कुछ है, क्योंकि किशोंरों के द्वारा अवसाद ग्रसित होकर की गई आत्महत्या सिर्फ तीन दिन की खबर बनकर रह गई। क्यों हॉस्टलों के पंखों पर जिंदगी झूल गई या आखिर में किसी मनोचिकित्सक की लाइन में लगना पड़ा।
कौन जिम्मेदार है जरा अंदाजा लगाइए, सिर्फ आप और हम जो कि बच्चों को दौडऩे के लिए कह रहे हैं। सिर्फ इसलिए ताकि हम शान से कह सकें कि वो हमारा बच्चा है या वो हमारे संस्थान का है। पर इस विकट परिस्थिति को शिक्षण व टयूशन संस्थान, समाज कब समझेगा जब अवसाद ग्रसित होकर एक और जिंदगी दीमक की तरह शनै:-शनै: खत्म हो गई। कहते हैं जब जागो तभी सवेरा पर हम कब जागेंगे। चलो शुरुआत करें व अवसाद रूपी समाज की इस गंदगी को हटायें। पहचानें असल में अवसाद क्या है। शिक्षा भाग्य जगाती है व शिक्षण व टयूशन संस्थानों की इमारतें जहां ये अवसाद की कलियां प्रतिस्पर्धा की आड़ में फूटती हैं, उन्हें वहीं नष्ट करें ताकि फिर कोई जिंदगी ये अवसाद ना लील सके व स्वस्थ समाज को साकार कर सके। किसी ने सच ही कहा है….

जिंदगी अनमोल है इसे यूं न गवाएं।
प्रतिस्पर्धा की दौड़ में इसे यूं ही न गवाएं।  (डायरेक्टर, दा नेक्सट लेवल, जयपुर)

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