World Health Day : सामाजिक निर्धारकों में समानता प्राप्त करने के जरिए निर्धारित किए जा सकते हैं 40 फीसदी स्वास्थ्य परिणाम – IIHMR

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जयपुर। ‘उच्च गुणवत्ता वाले पब्लिक हैल्थ प्रोफेशलन तैयार करने के लिए पब्लिक हैल्थ एजुकेशन की सख्त आवश्यकता है। पब्लिक हैल्थ (Public Health) का विकास मेडिकल हैल्थ से लेकर पब्लिक हैल्थ एजुकेशन (Public Health Education)के लिए सतर्क बदलाव का प्रतीक है। पब्लिक हैल्थ को मुख्य रूप से पाठ्यक्रम में शामिल किए जाने की महत्वपूर्ण आवश्यकता है और इस बारे में विकासशील देशों में अधिक गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।’ आईआईएचएमआर यूनिवर्सिटी की ओर से विश्व स्वास्थ्य दिवस (World Health Day) पर ‘ट्रांसफोर्मिंग पब्लिक हैल्थ एजुकेशन इन डवलपिंग नेशंस’ विषय पर आयोजित परिचर्चा में विशेषज्ञों ने ये विचार रखे। इन विशेषज्ञों में पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ़ इंडिया (PHFI) के प्रेसीडेंट पद्मभूषण डॉ श्रीनाथ रेड्डी और आईआईएचएमआर यूनिवर्सिटी के चेयरमेन डॉ। एसडी गुप्ता प्रमुख थे।

आईआईएचएमआर यूनिवर्सिटी के डीन रिसर्च डॉ एच के मंगल द्वारा कार्यक्रम की मध्यस्थता की गई और यह कहते हुए इसका सार बताया कि भारत में और विकासशील देशों में भी पब्लिक हैल्थ एजुकेशन की बदलती आवश्यकताओं पर ध्यान देने की आवश्यकता है।

आईआईएचएमआर के ट्रस्टी डॉ. अशोक अग्रवाल ने आईआईएचएमआर के योगदान को रेखांकित किया और पब्लिक हैल्थ एजुकेशन की आवश्यकता जताई। उन्होंने कहा कि ‘आईआईएचएमआर का एक अलग दृष्टिकोण है, जहां इस संस्था ने काम करना शुरू किया और पब्लिक हैल्थ के विशेषज्ञ क्षेत्रों के बारे में सोचना शुरू किया। पोलियो उन्मूलन के संदर्भ में यूनिवर्सिटी के अपने रिसर्च का जबरदस्त योगदान रहा है। यह पब्लिक हैल्थ के क्षेत्र में मैनेजमेंट प्रेक्टिसेज में कार्यान्वयन स्तर पर जोर देने के साथ पब्लिक हैल्थ के क्षेत्र में कार्य कर रहा है।

आईआईएचएमआर यूनिवर्सिटी पब्लिक हैल्थ, (IIHMR University) प्रशिक्षण, रिसर्च व एकेडमिक्स जैसे क्षेत्रों में हमेशा से प्रमुख संस्थान रहा है। कोविड-19 की वजह से पब्लिक हैल्थ में प्रशिक्षण के साथ-साथ इस क्षेत्र में और अधिक शोध की गहन आवश्यकता महसूस हुई है। इसके लिए आईआईएचएमआर यूनिवर्सिटी की ओर से हाल ही में एसडी गुप्ता स्कूल ऑफ पब्लिक हैल्थ की शुरूआत की गई है।’

पीएचएफआई के प्रेसीडेंट (Padma Bhushan) पद्मभूषण प्रो (डॉ.) के. श्रीनाथ रेड्डी ने कहा कि ‘यह देखने के लिए कि शेष बची हुई 21 वीं सदी में पब्लिक हैल्थ एजुकेशन को किस तरह से आकार देना है, पब्लिक हैल्थ की आवश्यकता को पूरा करना होगा। यह देखना आवश्यक है कि शिक्षा की अवधारणा के संदर्भ में पिछले 100 वर्षों में पब्लिक हैल्थ कैसे विकसित हुआ है। पब्लिक हैल्थ एक व्यापक अनुशासन है जिसे सिर्फ चिकित्सा व स्वास्थ्य तक सीमित नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह विज्ञान एवं समाज के बीच की सबसे बड़ी कड़ी है। व्यक्तिगत स्तर, हैल्थकेयर सिस्टम के स्तर पर और सामुदायिक स्तर पर विभिन्न निर्धारकों को एकीकृत और हल करना आवश्यक है। इक्विटी को होरिजेंटल इक्विटी व वर्टिकल इक्विटी, दोनों तरह से हल किया जा सकता है। प्रबंधन शिक्षा में स्वास्थ्य क्षेत्र के पूरे कैस्केड को शामिल किया गया है और इसे दक्षता एवं इक्विटी के साथ प्रबंधित किया जाना चाहिए। इसलिए पब्लिक हैल्थ डिसिप्लिन में प्रबंधन शिक्षा महत्वपूर्ण है।’

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आईआईएचएमआर यूनिवर्सिटी के चेयरमेन डॉ. एस. डी. गुप्ता ने कहा कि ‘पब्लिक हैल्थ में बदलाव में इक्विटी का अहम योगदान हो सकता है। हालांकि असमानताओं के मुख्य कारण अभी भी बने हुए हैं, जिनमें सुगमता व सामर्थ्य की कमी, गरीबी, शिक्षा की कमी, आय का असमान वितरण, आजीविका व उचित पोषण की कमी प्रमुख हैं। इन अंतरालों ने स्वास्थ्य क्षेत्र में प्रमुख चिंताएं पैदा की हैं। हम अभी तक मातृ मृत्यु और बाल मृत्यु दर के अंतराल को भरने में सक्षम हो सके हैं, लेकिन पोषण अभी भी एक चुनौती है। इसके लिए उपरोक्ता करणों की अहम भूमिका रही है। उन्होंने आगे ग्लोबल हैल्थ लीडरशिप के चार महत्वपूर्ण कार्यों को बढ़ावा देने पर जोर दिया, जो साथ मिलकर काम करनां, डेटा संग्रह में सुधार करना, असमानताओं के मूल कारण की पहचान कर उसे हल करना और टेस्ट किट, उपचार की दवाओं, कम आय वाले देशों में टीकाकरण जैसे संसाधनों को साझा करके सीमाओं से परे कार्य करना है।

डॉ. एस. डी. गुप्ता ने कहा कि इन असमानताओं में अंतराल की भरपाई करना और स्वास्थ्य का बड़ा चित्र देखना महत्वपूर्ण है, जिसमें यूनिवर्सल हैल्थ कवरेज के पहलु पर विशेष ध्यान देने के साथ सतत विकास लक्ष्यों पर प्रकाश डालना शामिल है।

मुख्य बिंदु यह है कि किसी की आय से अधिक खर्च को कैसे रोका जाए। कोविड-19 महामारी ने स्वास्थ्य क्षेत्र पर नकारात्मक प्रभाव डाला है, विशेष रूप से दुनिया भर में जीडीपी प्रभावित हुई है, गरीबी में काफी वृद्धि हुई है, और नौकरियों का नुकसान भी बड़े पैमाने पर हुआ है। यह विश्व स्वास्थ्य दिवस स्वास्थ्य क्षेत्र की असमानताओं को कम करने की दिशा में आगे बढ़ने का आह्वान कर रहा है। यह अभियान इस बात पर प्रकाश डालता है कि स्वास्थ्य किसी भी धर्म, जाति, पंथ और यहां तक कि किसी भी देश के हर व्यक्ति का एक मौलिक अधिकार है। बड़े पैमाने पर दुनिया भर में मनाए जाने वाले विश्व स्वास्थ्य दिवस पर यह परिचर्चा विशेष रूप बिल्डिंग ए फेयरर, हैल्दियर वर्ल्ड थीम पर आयोजित की गई है।’

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आईआईएचएमआर यूनिवर्सिटी के डीन रिसर्च डॉ. मंगल द्वारा इस परिचर्चा की मध्यस्थता की गई। उन्होंने पब्लिक हैल्थ कैडर की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि ‘स्वास्थ्य का मतबल रोगों का नहीं होना ही नहीं है, बल्कि इससे काफी अधिक है। इसका मतलब यह भी है कि लोगों को स्वच्छ पानी व स्वच्छता, हवा, आदि की भी आवश्यकता है जहां लोग स्वस्थ व बहतर जीवन जी सकें। असमानताओं को समाप्त करने के लिए स्वास्थ्य के सामाजिक निर्धारक महत्वपूर्ण हैं। हमें सामाजिक निर्धारकों के साथ संबंध स्थापित करने की आवश्यकता है।

सामाजिक निर्धारकों के माध्यम से स्वास्थ्य के परिणामों का केवल 40 प्रतिशत ही निर्धारित किया जा सकता है। स्वस्थ दुनिया के लिए बड़ा दृष्टिकोण आवश्यक है। यह पब्लिक हैल्थ एजुकेशन के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है। भारत व शेष दुनिया निष्पक्ष व न्यायसंगत होनी चाहिए। कोविड-19 को समाप्त करने, तकनीक के उपयोग, टेस्टिंग, उपचार, वस्तुओं में डेटा के वितरण आदि में तेजी लाने की आवश्यकता है।’

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