कहानी दस्तावेजों की जुबानी: 531 वर्ष पूर्व राव बीकाजी द्वारा बीकानेर की स्थापना

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* पूगल के मन्दिर में आज भी मौजूद है करणी माताजी का त्रिशूल
* पूगल के भाटी, जाट, गोदारों, राजपूत खींची छापर व द्रोणपुर के मोहल राजपूतों के गांवों को जीतकर मिलाया बीकानेर राज्य में।

बीकानेर। जोधपुर नरेश राव जोधा के हौनहार पुत्र राव बीका ने विक्रम संवत् 1545 मिती वैशाख बद 3, सन् 1488 ई. में बीकानेर राज्य की स्थापना की थी। सन् 1908 ई. में कलकत्ता से मुद्रित चाल्र्स गियर्सन ने लिंग्वेस्टिक सर्वे आॅफ इण्डिया वाॅल्यूम-9 में बीकाजी द्वारा बीकानेर राज्य की स्थापना का वर्णन किया गया है।

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राजस्थान राज्य अभिलेखागार के निदेशक डा.महेंद्र खड़गावत ने बताया कि राव बीकाजी संवत् 1522 ई. मिति आसोज सुद 10 जोधपुर से रवाना होकर मण्डोर में विश्राम करने के पश्चात् देशनोक में करणी माताजी की हाजरी में उपस्थित हुऐ। उनका आशीर्वाद प्राप्त कर चाण्डासर गांव होते हुए कोडमदेसर पहुंचे। बीकाजी तीन वर्ष तक कोडमदेसर में रहे तथा वहां एक छोटे पोट का निर्माण भी करवाया। कोडमदेसर के पश्चात् बीकाजी 10 वर्ष तक जांगलू गांव में रहे। बीकाजी कोडमदेसर में किले का निर्माण करवाना चाहते थे। परन्तु पूगल के शासक शेखों जी भाटी प्रतिदिन अपनी सेना के साथ आकर किले को ध्वस्त कर देते थे। बीकाजी ने शेखों जी भाटी की बेटी रंगकंवरजी के साथ विवाह कर लिया। इतिहासकारों व अन्य स्रोत सामग्रियों में बीकाजी के पूगल के साथ वैवाहिक सम्बन्ध में करणी माताजी की महत्वपूर्ण भूमिका मानते है। आज भी पूगल के किले में बने मन्दिर में करणी माताजी का त्रिशूल विद्यमान है।

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पूगल के भाटियों व बीकाजी के बीच लड़ाई हुई जिसमें बीकाजी ने पूगल के भाटियों को परास्त कर दिया। परन्तु फिर भी यदा-कदा भाटी अवसर देखकर बीकाजी पर आक्रमण करते रहते थे। बीकाजी ने रातीघाटी जहां वर्तमान में बीकानेर शहर बसा हुआ है, वहां पर विक्रम संवत् 1545 मिति वैशाख बद 3 वर्ष 1488 ई. में किले की नींव रखी तथा अपने राज्य की राजधानी बीकानेर बना ली। तत्पश्चात् बीकानेर राज्य का विस्तार करते हुए उन्होंने शेखसर रोणियें के गोदारा जाटों व अन्य जाट जातियों, खींची राजपूतों के गांवों पर आक्रमण कर उन्हें अपने राज्य में मिला लिया।
राव बीकाजी ने अपने छोटे भाई राव विदेजी को मोहल राजपूतों के गांव छापर द्रोणपुर पर आक्रमण करने के लिये भेजा। जोधपुर नरेश जोधाजी ने विदेजी की सहायता करते हुए मोहला अजीतमल को मारकर उसका राज्य अपने बेटे विदेजी को दे दिया। कुछ समय पश्चात् दिल्ली के बादशाह द्वारा हिसार के सूबेदार सारंग खां को मोहला की सहायता के लिये भेजा गया।
इस घटना की पुष्टि दयालदास द्वारा लिखी बीकानेर के राठौड़ों की ख्यात, मुंशी सोहनलाल की तवारिख राजश्री बीकानेर, देश दर्पण तथा गौरीशंकर हीराचन्द औझा अपनी पुस्तक बीकानेर राज्य का इतिहास में भी करते है।

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