राजस्थान : देशी पशुधन हमारे लिए वरदान: कुलपति प्रो. छीपा

वेटरनरी विश्वविद्यालय में वैज्ञानिकों का शीतकालीन प्रशिक्षण संपन्न
जलवायु-मौसम के प्रति संवेदनशीलता जरूरी: डाॅ. राठौड़
बीकानेर। भारतीय मौसम विभाग के पूर्व महानिदेशक डाॅ. एल.एस. राठौड़ ने कहा कि आजादी के बाद से देश में पशुधन की लगभग 35 प्रतिशत प्रजातियां लुप्त हुई हैं जो एक सामयिक और गंभीर चिंता का विषय है। डाॅ. राठौड़ रविवार को वेटरनरी विश्वविद्यालय में देशी पशुओं की नस्लों के संरक्षण एवं संवर्द्धन विषय पर वैज्ञानिकों के 21 दिवसीय शीतकालीन प्रशिक्षण के समापन समारोह को सम्बोधित कर रहे थे।

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भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् के वितपोषित शीतकालीन प्रशिक्षण में देश के 11 राज्यों से आए 25 वैज्ञानिक – विशेषज्ञों ने भाग लिया। मुख्य अतिथि डाॅ. राठौड़ ने कहा कि वैज्ञानिकों को सोचना होगा कि हरित क्रांति और शोध के बावजूद भी देश के कुल दुग्ध उत्पादन में देशी गोवंश का योगदान एक प्रतिशत का ही है। बदलती जलवायु परिस्थितियों में विदेशी और संकर नस्लों के मुकाबले देशी पशुधन अधिक कारगर और लाभदायक है। ब्राजील में गिर की नस्ल के पोषण स्तर और प्रबंधन उपायों से 40 से 60 लीटर दूध प्रतिदिन प्राप्त किया जा रहा है।

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उन्होंने कहा कि देशी पशुओं के पोषण में स्थानीय वनस्पति का उपयोग औषधी का काम करती है। पूर्व महानिदेशक ने कहा कि देश में जलवायु या मौसम के प्रति संवदेनशीलता में कमी का नुकसान कृषकों और पशुपालकों को उठाना पड़ता है। मौसम परिवर्तन के अनुकूल उपायों से रोगों की रोकथाम हो सकती है अतः उन्हें जागरूक किया जाए। उन्होंने वैज्ञानिकों से आहृान किया कि वे देशी पशुधन के वैज्ञानिक और पारंपरिक लालन-पालन के तरीकों का समन्वय कर पशुपालकों को जागरूक करें। समारोह की अध्यक्षता करते हुए वेटरनरी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बी.आर. छीपा ने कहा कि बदलते जलवायु परिवेश में देशी पशुधन हमारे लिए वरदान स्वरूप है।

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मौसम के प्रति अनुकूलन, कम पोषण खर्च और इनकी दुग्ध उत्पादन क्षमता भी किसी से कम नहीं है। अतः यह हमारे लिए सर्वथा हितकारी है। उन्होंने आशा जताई कि वैज्ञानिक प्रशिक्षण कार्यक्रम से पूरे देश के देशी पशुओं की नस्लों के विकास कार्यों को गति मिलेगी। वेटरनरी काॅलेज के अधिष्ठाता प्रो. त्रिभुवन शर्मा ने स्वागत भाषण में देशी पशुधन नस्लों की विशेषताओं व उपयोगिता तथा वेटरनरी विश्वविद्यालय में इस क्षेत्र में किए जा रहे अनुसंधान कार्यों की जानकारी दी।

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राजुवास के छात्र कल्याण अधिष्ठाता और प्रशिक्षण निदेशक प्रो. एस.सी. गोस्वामी ने बताया कि 21 दिवसीय प्रशिक्षण में 60 विषय विशेषज्ञों के व्याख्यान और डेमो प्रस्तुत किये गए। प्रायोगिक कार्य के रूप में वैज्ञानिकों ने राष्ट्रीय, उष्ट्र, भेड़ एवं ऊन, अश्व अनुसंधान केन्द्रों, राजुवास के पशुधन अनुसंधान केन्द्र चांदण, बीकानेर, बीछवाल और कोड़मदेसर के भ्रमण के अलावा वेटरनरी विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों में कार्य प्रणाली का अवलोकन किया। समारोह के अंत में संभागी वैज्ञानिकों ने प्रशिक्षण को अत्यंत उपयोगी और प्रभावी बताया। इस अवसर पर अतिथियों ने सभी प्रशिक्षणार्थी वैज्ञानिकों को प्रमाण-पत्र प्रदान किये। समारोह में वेटरनरी विश्वविद्यालय और स्वामी केशवानंद राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय के निदेशक एवं अधिष्ठातागण और राजुवास फैकल्टी सदस्यों ने भाग लिया।

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